श्री नाथद्वारा में १० जुलाई से मोरारीबापू द्वारा मंगलकारी संवादी रामकथा का शुभारंभ

श्री नाथद्वारा में १० जुलाई से मोरारीबापू द्वारा मंगलकारी संवादी रामकथा का शुभारंभ

भारत के राजस्थान प्रांत के राजसमन्द जनपद के अन्तर्गत बनास नदी के किनारे पर स्थित श्री नाथद्वारा हिन्दू धर्म की पुष्टि मार्गीय वैष्णवी शाखा की प्रमुख पीठ है। यहाँ नंदनंदन आनन्‍दकंद श्रीनाथजी का भव्‍य मन्‍दिर है। श्रीनाथजी श्रीकृष्ण भगवान के ७ वर्ष की अवस्था के स्वरूप हैं। श्रीनाथजी वैष्णव संप्रदाय के केन्द्रीय पीठासीन देव हैं, जिनकी परंपरा 'पुष्टिमार्ग' या वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित 'वल्लभ सम्प्रदाय' के रूप में जानी जाती है। 

    ऐसी पुष्टि सेवाभिरत भूमि में मोरारीबापू की 862 वीं रामकथा का समायोजन, आदेश गौ संरक्षण संस्थान, राबचा, नाथद्वारा, राजस्थान के द्वारा किया गया है। इस कोरोना की स्थिति में, प्रशासकीय नियमों के पूर्ण अनुपालन के साथ और पूर्व सूचना से आमंत्रित किये गए सिमित श्रोताओं के साथ कथा-गान का आयोजन किया गया है। इस कथा का केन्द्रीय संवाद 'मानस तत: किम्' पर आधारित है। इस कथा की मुख्य चौपाइयाँ अयोध्याकांड से हैं।


*जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं।* 

*ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।*


*मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें।* 

*सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।*

   दशरथ जी अपने गुरु जी के चरणों में निवेदन करते हैं कि जो अपने बुद्धपुरुष की चरण-धूली सिर पर धारण करता है वह समग्र ऐश्वर्य को अपने वश कर लेता है। मेरे समान ऐसा अनुभव किसी ने किया नहीं है। दशरथ जी के इस कथन को पुष्ट करते हुए बापू ने कहा की मेरा भी यह शत प्रतिशत अनुभव है। और यह केवल मेरा अनुभव ही नहीं, कई भाई-बहनों के ये अनुभव हैं। हम सब पर गुरुतत्त्व का अहैतुक अनुग्रह है।

जगद्गुरू आदि शंकराचार्य के स्तोत्र में से 'तत: किम्' की व्याख्या करते हुए बापू ने कहा कि, शंकराचार्यजी ने इस स्तोत्र में कहा है कि मेरु तुल्य धन हो तो भी अगर गुरु के चरणों में मन नहीं लगा तो..फिर क्या? हमें छहों अंग के साथ चारों वेद कंठस्थ हों फिर भी, अगर अपने गुरु के चरणों में हमारा मन नहीं लगा तो...तत: किं...तत: किम्? इन दोनों पंक्तियों में वर्णित दशरथ जी का जो अनुभव है वह अगर हमारे अनुभव में न आया तो... तत: किम् ?

     बापू ने कहा, वैसे गोवंश के लिए हमने बहुत कथाएं की हैं पर गौशाला में कथा पहली बार हो रही है। यह कथा कोई धार्मिक सम्मेलन या धर्मशाला नहीं है, यह तो तलगाजरडा़ द्वारा विनयपूर्वक चलायी जा रही नौ दिन की एक प्रयोगशाला है, प्रेम यज्ञ है, जिससे हमारी विशेष जागृति हो। बापू ने श्रीनाथ जी के मुखारविंद की सुंदर छवि-दर्शन की प्रसन्नता व्यक्त की। बापू ने कहा एक गोप्य संकेत करते हुए कहा कि मंगलमय मनोरथ की पूर्ति के लिए इधर-उधर मत जाना, महादेव के पास जाना। क्योंकि वह त्रिभुवन गुरु है, उनमें सभी गुरुजन समाहित हैं। वैसे अयोध्या के इष्ट देव श्रीरंग है, उनकी वैष्णवी परंपरा है लेकिन, विपत्ति में अयोध्या के सभी पात्र जब शरण गएं तो शिव के ही शरण गएं।

    गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व के इन भीगे दिनों में हजारों श्रोताओं के कान और ध्यान इस कथा की ओर आतुरता से लग गए हैं। आस्था चैनल और चित्रकूट धाम यूट्यूब चैनल के माध्यम से इस कथा का जीवंत प्रसारण  दिनांक १० जुलाई २०२१ सायं ४:०० से ६:०० तक और ११ से १८ जुलाई तक प्रातः १०:०० से १:०० तक किया जाएगा। सब श्रोताओं को अनुरोध है की घर बैठे कथा का आनंद लें।

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